गुटी वटी कल्पना आयुर्वेद में रुग्ण चिकित्सा के लिए अनेक कल्पो का विचार किया गया है, जैसे कषाय कल्पना , स्नेह कल्पना, संधान कल्पना इत्यादि। जांगम, औदभिध और पार्थिव औषधियों को प्राकृत स्तिथी में उपयोग नही किया जा सकता है। इसलिए इन द्रव्यों को सात्म्य और सेवन योग्य बनाने के लिए विविध संस्कार किये जाते है, जैसे, शोधन, मारण, भस्मीकरण, चूर्णित, स्वरस, पुट इत्यादि। रोग और रोगी की चिकित्सा के लिए औषधि का चयन उसके सूक्ष्म परीक्षण करने के बाद किया जाता है। गुटी-वटी कल्पना भी इनमें से एक कल्पना है। व्याख्या: बटको मोदकः पिण्डी गुडो वर्तिस्तथा वटी । वटिका गुडिका चेति संज्ञावान्तर भेदतः ।। वटक, मोदक, पिण्डी, गुड़, वर्ति, वटी और वटिका तथा गुटिका यह सब एक ही प्रकारकी बनावट है, केवल आकार और परिमाणमें भेद होता है। इनमें प्रधान भाग काष्ठौषधियोंका ही होता है। वटी कल्पना यह कल्क कल्पना का ही भाग है तस्य समस्तद्रव्यापरित्यागाद् आप्लुतोपयोगाच्च कल्कादभेदः ।(अष्टाङ्गसंग्रह क०१८) भावनाविधि: द्रवेण यावता द्रव्यमेकीभूयाद्रतां यजेत् । तावत् प्रमाणं कर्तव्यं मिषग्भिर्भावना विधौ ।। भाव्यद्रव्यसमं काथ्यं क्वाथ्यादष्टगुणं जलम् । अष्टांशशोषितः काथो भाव्यानां तेन भावना ।। जितने द्रव पदार्थसे औषधि अच्छी तरह भीग जाय उतना ही द्रव पदार्थ लेकर भावना देनी चाहिये । अथवा जिस चीज़के काथसे भावना देनी हो वह भाव्य (जिसे भावना देनी हो) द्रव्यके बराबर लेकर आठ गुने पानीमें पकाने और आठवां भाग शेष रहने पर छानकर उससे भावना दे। यदि गोलियोंको धूपमें सुखानेके लिये लिखा हो तो धूपमें और छायामें सुखानेके लिये लिखा हो तो छायामें ही सुखाना चाहिये, क्योंकि धूप और छांवके प्रभावसे भी दवाके गुणमें अन्तर पड़ जाता है। गुटी – वटी निर्माण विधि प्रकार: 1. साग्नि/ निराग्नि 2. भावना : स्वरस/गोमूत्र/दुग्ध/मधु/जल/घृत 3. Binding : गुड़/शर्करा/गुग्गुल/मधु 4. अनुपान: स्वरस/फलरस/दुग्ध/छाछ इत्यादी गुटी वटी बनाते समय binding का प्रमाण 1. शर्करा: चूर्ण के 4 गुना 2. गुड़: चूर्ण के 2 गुना 3. गुग्गुल: चूर्ण के समभाग 4. मधु: चूर्ण के समभाग 5. जल/स्वरस: मर्दन के आवश्यकता अनुसार गुटी – वटी का संदर्भ संहिताओं में अनेक बार किया गया है 1. गुटिका : चरक/अष्टांग संग्रह/ अष्टांग हृदय/ चक्रदत्त/ भैषज्य रत्नावली 2. गुडम : चरक 3. वटक : चरक /सुश्रुत/ अष्टांग संग्रह/ अष्टांग हृदय / चक्रदत्त/ शारंगधर 4. वटी : अष्टांग संग्रह/अष्टांग हृदय/चक्रदत्त/शारंगधर सवीर्यता अवधि: वटी/वटक/गुटिका : 1 वर्ष गुटीकादि निर्माण की आवश्यकता? जब आयुर्वेद में पहले से ही अनेक प्रकार के कल्पो का उल्लेख है, तो फिर गुटी वटी की निर्माण की इतनी आवश्यकता क्यों? इसके कारण निम्न है 1. सेवन के लिए सुखकर 2. उचित और निर्धारित मात्रा में औषधि का सेवन 3. दूसरे कल्पो की तुलना में सवीर्यता अवधी अधिक काल तक है 4. भंडारण और परिवहन के लिए सुखकर 5. भावना द्रव्यों के अनुसार अनुकूल 6. अधिक समय तक ले सकते है 7. छोटे बच्चो से वृद्धो तक, सभी के सेवन के लिए सुखकर आयुर्वेद में वर्णित अनेक गुटी वटी और उनके संदर्भ एवं रोगाधिकार/उपयोगिता का यहां संकलन करने की कोशिश की गई है कल्प (गुटी-वटी) संदर्भ रोगाधीकार / उपयोग 1 अङ्कोट वटक भा.प्र.अति. वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज अतिसार 2 अग्निकुमार मोदक भा.प्र.अति. ग्रहणी, श्वास, खांसी, आमवात, मंदाग्नि, जीर्णज्वर, विषमज्वर, विबंध, अफारा, शूल, यकृत, प्लीहा, 18 प्रकार के कुष्ठ, उदावर्त, गुल्म 3 अग्निगर्भा वाटिका र.र.प्ली. चि. प्लीहा, गुल्म, उदररोग, शूल, यकृत, अष्ठीला, कामला, हलीमक, पाण्डु, कृमि, कुष्ठ, अफारा, खांसी, व्रण, विस्फोटक, श्लेष्मज संग्रहणी 4 अग्नि जननी वटी र. र. स.अ. 16 अग्नि दीप्त 5 अग्नितुण्डी वटी भै. र.अ. मां अग्निमांद्य 6 अग्नि दीपनी वटी र.रा.सु. अग्नि दीपन 7 अगस्ति मोदक यो.र.अग्नि. चि. सूजन, बवासीर, ग्रहणी, खांसी, उदावर्त 8 अगस्ति वटी वृ. नि. र.शूला. शूल, गुल्म, कृमि, मंदाग्नि, प्लीहा, आमवात 9 अजमोदादि वटक भै. र.आ.वा.चि. आमवात, हैजा, प्रतूनी, हॄदरोग, उग्र गृध्रसी, कमर, बस्ती, गुदा और जंघा की हडफुटन, सूजन, गठिया 10 अजमोदादी वटी वृ.निं.र.भा. 5 संधिवात, दारुण आमवात, आढ्यवात, हनुस्तम्भ, शिरोवात, अपतानक, भ्रू शंख, कर्ण, नाक, आंख और दारुण जिव्हास्तम्भ आदि, लंगड़ापन, लूलापन, सर्वांग वायु, एकांग वायु, अर्दित, पादहर्ष, पक्षाघात 11 अजाज्यादि गुटिका वृ.नि.र. सभी प्रकार की बवासीर 12 अजीर्णहरीवटी यो.र.अ.चि. क्षुधावर्धक, शूल, जीर्णज्वर, खांसी, अरुची, पांडू, दाह, उदररोग, खुजली, आमवात, अफारा, हलीमक, मंदाग्नी 13 अनङ्गमेखलागुटिका वृ. यो. त. वीर्यस्तम्भक और कामवर्द्धक 14 अनङ्गमेखलामोदक वृ. यो. त. बलवर्द्धक, वीर्य वर्द्धक, कामशक्ति वर्द्धक, वीर्य स्तम्भक, पाण्डु, खांसी, क्षय, श्वास, शूल, प्रमेह, व्रण और भ्रम नाशक तथा अग्नि संदीपक 15 अभयादिगुटिका वृ. नि. र. भा. ५. आ. वा. आमरोग 16 अभयादि चतुस्समवटी वृ. यो. त. त्रिदोष, आमातिसार, अफारा, विबंध, हैजा, कामल, अरुचिका, अग्निप्रदिप्त 17 अभयादिमोदक शा. ध. सं. उ. खं. अ. ४ विषम ज्वर, मन्दाग्नि, पाण्डु, खांसी, भगंदर, दुष्ट कोढ़, गुल्म, बवासीर, गलगण्ड, भ्रम, उदररोग, विदाह, प्लीहा, प्रमेह, यक्ष्मा, नेत्ररोग, वातरोग, अफारा, मूत्रकृच्छ, पथरी, पृष्ठ पार्श्व, उरू, जांघ तथा उदरशूल 18 अभयामोदक (१) वृ. यो. त. प्लीहा, बवासीर, गुल्म, उदररोग, पाण्डु और मन्दाग्नि 19 अभयामोदक (२) वृ. नि. र. भा. ५ पा. चि. पाण्डु 20 अभया वटी रसे. चि. म. जीर्णज्वर, पाण्डु, प्लीहा, उदररोग, रक्त पित्त, अम्लपित्त, पित्ताजीर्णादिक 21 अभ्रकहरीतकी र. रा. सु. त्रिदोषज अर्श 22 अभ्रकादिवटी वृ. नि. र. भा. ४ सं. चि. ४ प्रकारकी संग्रहणी 23 अभ्रवटिका (१) रा. रा. सु. खांसी, क्षय, श्वास, कफ़, वायुके रोग और ज्वर, अतिसार, चातुर्थिक ज्वर, सूतिका रोग 24 अमरसुन्दरीवटी वृ. नि. र. भा. ५वा. व्या. अपस्मार, सन्निपात, श्वास, खांसी, गुदरोग, अस्सी प्रकारके वायुरोग और विशेष कर उन्मादका नाश करती हैं 25 अमृतकल्पवटी र. सा. सं. अ. चि शूल, मंदाग्नि, अजीर्ण 26 अमृतप्रभावटी वृ. नि. र. भा. ५; अरुचौ अजीर्ण तथा अग्निमांद्य 27 अमृतवटी (१) रसे. चि. म. अ. ९ अजीर्ण, कफ रोग, वायुरोग नाशक तथा अग्नि दीपक और रुचि वर्द्धक है। 28 अमृतवटी (२) भै. र.अ. मां. कफ, पित्तरोग और अग्निमान्द्य 29 अमृतवर्तिका भै. र. रसायने श्रेष्ठ रसायन 30 अमृतसारगुटिका र.र.रसायने. रसायन 31 अमृताङ्कुरवटी भै. र. क्षुद्र क्षुद्र रोग, पित्त और रक्तदोषज रोग, जीर्ण ज्वर, प्रमेह, कृशता और अग्निमांद्य, बल पुष्टि और कान्ति तथा बुद्धि बढती हैं। 32 अमृतानामगुटिका र. रा. सु. ८० प्रकार की वात व्याधि, १८ प्रकार के कुष्ठ, २० प्रकार के प्रमेह, ६ प्रकार के अपस्मार, नाड़ी व्रण (नासूर) ११ प्रकारका क्षय, ऊर्ध्वश्वास, सूजन, प्रसूतवात, आमवात, पाण्डु, कामला, बवासीर आदि 33 अम्लपित्तान्तको मोदकः भै. र. अ. पि. वमन, मूर्छा, दाह, खांसी, श्वास, भ्रम, प्रमेह, सूतिका रोग, शूल, अग्निमांद्य, मूत्रकृच्छ्र, गलग्रह और